Doosra Akash By Dr Naresh Dadhich
दूसरा आकाश
दूसरा आकाश
विधा : काव्य संग्रह
द्वारा : डॉ. नरेश दधीच
मोनिका प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित
प्रथम संस्करण : 2021
मूल्य : ₹ 290.00
समीक्षा क्रमांक : 126
अपने आप में 92 दुर्लभ एवं विविधता लिए हुए भावों को
संजोए हुए एक ऐसी कृति है जिसे सहज में लिया जाना सृजक एवं सृजन के संग अन्याय ही
होगा। जमीन से जुड़ी हुई किंतु प्रगति को उन्मुख , तथा
सृष्टि को , इस जगत को एक भिन्न दृष्टि से अपने ही नजरिए से
देखने का प्रयास है। एक नया ही व्यक्तित्व है ,गंभीर विचरण
है एवं उस विचारण को समर्थित करता व संबल प्रदान करता भाषा का सुंदर कलात्मक प्रयोग भी दर्शनीय है। उनके विचारों की सम्पूर्ण एवं
स्पष्टता प्रदर्शित करती हुई है संग्रह की पहली ही कविता "कवि" उनकी
कविता सामान्य से कुछ भिन्न है यथा शीर्षक भी दूसरा
आकाश है और सामान्य से भिन्न है उनका आकाश । उनकी कविता “मेरा अस्तित्व” कहीं भीतर
तक प्रभावित करती है जहां उनके अमिट एवं स्थाई रहने के भावों के स्पष्ट संकेत
मिलते हैं जब वे कहते हैं कि:
मेरे आंगन की धूप मेरा इंतजार करती है आज भी
मेरे बगीचे के फूल मुस्करा कर मेरा स्वागत करते हैं
वो पेड़ भी जो बूढ़ा हो गया है
झुक कर मुझे छू लेता है
मैं अभी गायब नहीं हुआ हूं।
उनका कवि हृदय आमजन के भावों को उनके सपनों और हकीकतों को अभिव्यक्त करने हेतु शब्द प्रदान करता है उनके भीतर न तो कहीं संभावनाओं का सिलसिला समाप्त हो रहा है ना ही नए सपनो का जन्म प्रतिबंधित। उनकी कविताओं का केंद्र उनके भाव हैं या यूं कहें कि भावप्रधान कविताएं सृजित की हैं जो आम जन के भाव हैं जमीनी लोगों के भाव हैं ।
वे कहते हैं की इस संग्रह की कवितायें हाल फिलहाल की
कविताएं हैं अर्थात उनमें हमें आज के समाज एवं परिवेश की झलक ही मिलती है जैसा कि
उनकी कविता "आम आदमी की पीढ़ा" में एक आज के थके हारे मजलूम
से बेबस इंसान की अंतरात्मा से उठी आवाज़ की दर्शाती है व व्यवस्था पर तंज करती है। उनकी कुछ कविताएं
संदेशात्मक भी है या कहें की सोए हुए समाज को जागृत होने का या उठ खड़े होने का
संदेश देती हैं जैसा कि उनकी इसी संग्रह की एक कविता" बदलना " है।
कुछ भी नहीं बदला है
हम वहीं खड़े हैं चोरहे पर किंकर्तव्ययविमूढ़
जहां पर खड़े थे हमारे पुरखे
करते इंतजार उन हवाओं का
जो ले जाएंगी हमें उन पहाड़ों के पार
जो आकांक्षाओं के प्रस्तर से बने हैं
.. .. ..
कवि हृदय की व्यथा को अत्यंत खूबसूरती से बयां करती हुई
कविता है “कविता के पात्र” जहां वे वर्तमान में कविता के असम्मानजनक स्तर को स्पष्टतः जानते समझते हुए कहते हैं की कविता से लोगों
के जीवन में कोई विशेष बदलाव आ जाएगा अथवा
क्रांति जैसा कुछ परिवर्तन कविता ला सकती हो वह बात कविता में तो नहीं है, एवं अत्यंत
दुखित हृदय से वे लिखते हैं की जिस पेपर में कविता छपती है लोग उसके भिन्न उपयोग कर
लेते हैं किन्तु कविता की ओर तो देखते तक नहीं इससे बड़ी उपेक्षा और क्या हो सकती है
।
वे कविता की इस नाकदरी से व्यथित हैं ही एवं यह व्यथा
उनकी कविता में सपष्टतः झलकती है। वे लिखते हैं की :
सभी तो हैं कविता के पात्र
पर कविता उन के जीवन में बदलाव नहीं लाती
वो अखबार , वो पत्रिका , जिसमें मेरी कविता छपी है
आज समोसे रखने के काम या रही है
कल उसको पढ़ कर शायद कोई क्रांति करेगा
उनके इस क्रांति के भाव से जहां कविता आशावाद की ओर जाती
दिखलाई पड़ती है वहीं संभवतः यह एकम कटाक्ष भी प्रतीत होता है। दोनों ही स्थितियाँ कविता
के वर्तमान स्वरूप को दर्शाती हैं।
कविता में जहां आशावाद की बात करते हैं तो कविता “कहीं
पर” का जिक्र किया जाना स्वाभाविक ही है, जहां वे आम जन मानस के आशावादी चरित्र को
सामने लाते हैं जिसकी बेहद मामूली सी अभिलाषाएं हैं किन्तु उनके माध्यम से वे क्रूर
समकालीन यथार्थ को भी प्रस्तुत करते हैं। तथापि उम्मीद की एक किरण बाकी रह जाना ही उनका विश्वास और संभावनाओं के प्रति उनके
दृष्टिकोण को परिभाषित करता है। वे कहते हैं कि :
कहीं
पर तो होगा
वो
दिल जो धडका नहीं है
वो
हाँ जो हुई नहीं है
वो
आवाज जो सुनी नहीं
कहीं
पर तो होगा
वो
दम तोड़ता पत्ता
वो
खारे पानी का कुवाँ ..........
नरेश
जी की कविताओं में गंभीर चिंतन एवं आम इंसान के इर्द गिर्द रहते हुए प्रकृति को मूल
रूप मे साथ में रख कर किया सृजन स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। नरेश जी मूलतः शिक्षविद
के रूप में जाने जाते हैं किन्तु अपनी कविताओं के द्वारा जो विशेष भाव वे प्रस्तुत
करते हैं वह उन्हें विभिन्न ख्यातिलब्ध कवियों से कहीं ऊपर आसीन करता है।
अतुल्य


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